असाइनमेंट, थकान और स्ट्रेस
आज पूरा दिन असाइनमेंट में उलझा रहा। रिपोर्टिंग का एक प्रोजेक्ट अधूरा पड़ा था, और डेडलाइन खतरनाक तरीके से करीब आ रही थी। प्रोफेसर विनय ने बोला था कि अच्छी स्टोरी खोजनी है, लेकिन असलियत ये है कि स्टोरी खोजने से ज़्यादा मुश्किल उसे लिखना है। दोपहर में कैंटीन गया, सोचा कॉफी पीकर दिमाग चलेगा, लेकिन वहां भी सब असाइनमेंट की ही बातें कर रहे थे। लगा जैसे पूरा डिपार्टमेंट इसी प्रेशर में जी रहा है। वापस आकर वर्ड डॉक्यूमेंट खोला और सोचा—"आज नहीं लिखा तो फिर कभी नहीं होगा।" फिर किसी तरह 500 शब्द टाइप कर ही दिए।
दिन 2: लैब क्लास और रिपोर्टिंग की असलियत
आज लैब क्लास में प्रोफेसर ने अचानक बोला—"जाओ, कैंपस के बाहर जाओ, किसी से बात करो और एक स्टोरी लेकर आओ।" सुनते ही पूरे क्लास का एक्सप्रेशन बदल गया। सबको लगा था कि आज सिर्फ एडिटिंग वगैरह सिखाई जाएगी, लेकिन नहीं, असली ग्राउंडवर्क करना था। मजबूरी में कैमरा और नोटबुक उठाई और निकल पड़ा। एक दुकानदार मिला, जो पिछले 15 साल से यही परचून चला रहा था। उसने महंगाई और बदलते ग्राहक ट्रेंड्स पर ऐसी बातें बताईं जो किसी भी रिपोर्ट से ज़्यादा रियल लगीं। जब वापस क्लास आया, तो लगा कि हां, यही तो असली रिपोर्टिंग है।
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