पाँचवां हफ्ता
रिपोर्टिंग में फील्डवर्क की अहमियत
आज की क्लास में फील्डवर्क पर चर्चा हुई—क्लासरूम में बैठकर खबरें लिखना आसान है, लेकिन असली पत्रकारिता बाहर जाकर होती है। एक सीनियर ने बताया कि कैसे ग्राउंड रिपोर्टिंग करते वक्त उन्हें विरोध झेलना पड़ा था, क्योंकि उनकी स्टोरी सरकार के खिलाफ थी। मैंने सोचा, क्या मैं इतना साहसी बन पाऊंगा? क्या मैं भी बिना डरे सच दिखा पाऊंगा? पत्रकारिता ग्लैमर से ज्यादा हिम्मत का खेल है। शायद इसीलिए इसे "सत्ता के खिलाफ खड़े होने की ताकत" कहा जाता है।
असाइनमेंट, चाय और स्ट्रेस
आज पूरा दिन असाइनमेंट में निकल गया। क्लास खत्म होते ही लाइब्रेरी में बैठ गया, लेकिन नोट्स देखने का मन नहीं था। कैंपस के एक कोने में जाकर अकेले चाय पीने लगा। सोचा, कितना कुछ सीखना बाकी है। इंटरनेशनल पॉलिटिक्स, मीडिया एथिक्स, रिपोर्टिंग स्किल्स—हर चीज़ में परफेक्ट होना असंभव लगता है। फिर लगा कि शायद पत्रकारिता का असली मज़ा इसी में है—सीखते रहना, गलतियाँ करना और आगे बढ़ते जाना। स्ट्रेस तो रहेगा, लेकिन यही तो गेम है।
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