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दूसरा हफ्ता
सुबह की क्लास और नींद से लड़ाई
8:30 AM की क्लास किसी सजा से कम नहीं लगती। आधे लोग चुपचाप बैठे थे, आधे नींद में। प्रोफेसर कुछ समझा रहे थे, लेकिन दिमाग सोया हुआ था। फिर अचानक "भारत-चीन संबंधों में मीडिया की भूमिका" का टॉपिक आया, और सबकी नींद उड़ गई। क्लास में बहस छिड़ गई कि कैसे मीडिया देशों के बीच संबंधों को प्रभावित करता है, और सरकारें इसे अपने फायदे के लिए कैसे इस्तेमाल करती हैं। मैंने भी कुछ कहा, और पहली बार प्रोफेसर ने मेरी बात पर सिर हिलाया। लगा कि शायद मैं सही दिशा में जा रहा हूँ।
लाइब्रेरी में एक अधूरी कहानी
आज लाइब्रेरी में बैठा तो एक पुरानी रिसर्च पेपर पर नज़र पड़ी—"भारत और चीन के बॉर्डर विवाद में मीडिया की भूमिका।" पढ़ना शुरू किया, तो लगा जैसे ये सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि आज भी हो रहा है। अपने पेपर के लिए कुछ नोट्स बनाए, लेकिन फिर समझ आया कि ये सब लिखने से पहले खुद को क्लियर करना होगा। क्या मीडिया सच में न्यूट्रल रह सकता है? या सबकुछ कहीं न कहीं पॉलिटिक्स से जुड़ा है? इतने सवाल थे कि जवाब अधूरे रह गए। शायद इसीलिए पत्रकारिता इतनी मुश्किल और इतनी ज़रूरी है।
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