तीसरा हफ्ता

कैंटीन की बहस—लोकतंत्र और मीडिया

आज कैंटीन में चाय पीते-पीते एक बहस छिड़ गई—क्या मीडिया लोकतंत्र को मजबूत करता है या बस पॉलिटिकल नैरेटिव चलाने का एक जरिया बन चुका है? कुछ लोगों का मानना था कि फ्री प्रेस के बिना लोकतंत्र अधूरा है, तो कुछ कह रहे थे कि मीडिया का इस्तेमाल जनता को गुमराह करने के लिए किया जा सकता है। मैं सुनता रहा, फिर बीच में बोला—"शायद असली सवाल ये नहीं कि मीडिया क्या कर रहा है, बल्कि ये कि जनता कितनी जागरूक है?" इतना कहते ही बहस और गर्म हो गई। पत्रकारिता में आने के बाद, अब हर बातचीत सिर्फ बातचीत नहीं, एक स्टोरी लगती है।

 रिपोर्टिंग का पहला असली अनुभव

आज प्रोफेसर ने हमें कैंपस के बाहर जाकर एक स्टोरी कवर करने को कहा। भाग्य से, पास के बाज़ार में एक विरोध प्रदर्शन हो रहा था—सरकार की नई नीति के खिलाफ। पहली बार लगा कि असली रिपोर्टिंग कितनी मुश्किल होती है। प्रदर्शनकारियों से सवाल पूछना, पुलिस की नज़रों से बचना और सही तथ्य जुटाना—सब कुछ नया था। वापस आकर जब रिपोर्ट लिखी, तो लगा कि ये सिर्फ एक स्टोरी नहीं, बल्कि एक एक्सपीरियंस था। किताबों में जो पढ़ा था, वो जमीन पर कुछ और ही था। यही पत्रकारिता की खूबसूरती है—सबकुछ डायनामिक, सबकुछ असली।

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