चौथा हफ्ता
इंटरनेशनल रिलेशंस और मीडिया का खेल
आज इंटरनेशनल रिलेशंस की क्लास में डिस्कशन हुआ कि कैसे देश अपनी छवि सुधारने के लिए मीडिया का इस्तेमाल करते हैं। रूस, चीन, अमेरिका—हर देश की अपनी रणनीति है। हम भारत की पॉलिसी पर बात कर रहे थे कि प्रोफेसर ने पूछा—"अगर तुम्हें किसी देश की मीडिया पॉलिसी बदलनी हो, तो क्या करोगे?" सवाल इतना सीधा नहीं था। कुछ ने कहा कि फ्री मीडिया को बढ़ावा देंगे, तो कुछ ने कहा कि सरकारों को कंट्रोल में रखना चाहिए। मैंने सोचा, सच क्या है? शायद जवाब उतना आसान नहीं, जितना क्लास में लगता है।
स्ट्रीट फूड और राजनीति
आज क्लास के बाद दोस्तों के साथ स्ट्रीट फूड खाने गया। हमने गोलगप्पे वाले से मज़ाक में पूछा कि चुनावों में किसे वोट देंगे, और उसकी बातें सुनकर दिमाग घूम गया। उसने बताया कि कैसे छोटे दुकानदारों को हर सरकार से उम्मीदें होती हैं, लेकिन अंत में बदलाव कम ही दिखता है। एक आम आदमी की पॉलिटिक्स पर इतनी गहरी समझ? शायद यही ग्राउंड लेवल का सच है, जो अखबारों और टीवी चैनलों में नहीं दिखता। लगा कि असली पत्रकारिता यही है—लोगों की बात सुनना, बिना किसी फिल्टर के।
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