छठा हफ्ता

 दोस्ती, करियर और फ्यूचर की टेंशन

आज दोस्त के साथ देर रात तक बातें होती रहीं। मुद्दा वही—आगे क्या करेंगे? पत्रकारिता में नौकरी मिलेगी? इंटरनेशनल रिलेशंस की पढ़ाई का क्या फायदा होगा? जॉब सिक्योरिटी है? सबके पास सवाल थे, लेकिन किसी के पास जवाब नहीं। किसी को रिसर्च में जाना था, किसी को पॉलिसी मेकिंग में, और मैं? मुझे अब भी नहीं पता कि मुझे न्यूज़रूम में रहना पसंद है या ग्राउंड रिपोर्टिंग करनी है। शायद ये उलझन ही इस फील्ड का हिस्सा है। कोई तयशुदा रास्ता नहीं है, जो जितना एक्सप्लोर करेगा, उतना आगे जाएगा।

पत्रकारिता क्यों?

आज अचानक खुद से सवाल किया—मैंने पत्रकारिता क्यों चुनी? न्यूज़रूम की स्पीड, स्टोरीज़ की ताकत, या फिर सच को खोजने की जिद? शायद इन सबका मिला-जुला असर था। लेकिन जितना इस फील्ड में आगे बढ़ रहा हूँ, उतना लग रहा है कि पत्रकारिता सिर्फ खबरें देने का काम नहीं, बल्कि लोगों को सोचने पर मजबूर करने का जरिया है। हर स्टोरी सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि किसी की ज़िंदगी का हिस्सा होती है। और यही कारण है कि हर मुश्किल, हर असाइनमेंट, और हर स्ट्रेस के बावजूद मैं यही करना चाहता हूँ।

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